क्या राजा, क्या प्रजा

जे.एन रिपोर्टर
जयपुर। काशी नरेश महाराज विश्वेश्वराय की न्यायप्रियता और उदारता की धूम थी। एक दिन दरबार लगते ही कुछ गरीब लोग काशी नरेश के पास रोते हुए आगे और कहा, 'महाराज, हम गरीबों की झोंपडिय़ा जला दी गई हैं, हम बर्बाद हो गए हैं। कहां रहे, क्या खाएं, क्या पहनें? हमारा सब कुछ जलाकर राख कर दिया गया है।
राजा ने पूछा, ऐसा अधर्म किससे हुआ है। लोगों ने कहा, महाराज यह आपके महल से हुआ है। महाराज ने आश्चर्यचकित होते हुए दीवानजी से पूछा। दीवान ने कहा, हां महाराज यह सच है।
राजा ने कहा कि पहले तो इन गरीबों को राज्य के खर्चे पर झोंपडिय़ा बनवा दो। उनका जो सामान जला है, उसका भी हर्जाना दे दो। प्रत्येक को एक-एक कम्बल और शाम का भोजन महल की ओर से करवा दो। झोंपडिय़ा शाम तक बन जानी चाहिए। गरीब लोग नमस्कार कर चले गए। महाराज ने कहा, दीवानजी अब हमारे सामने दोषी को लाया जाए। दीवान ने कहा, महारानीजी से ऐसा हुआ है। महाराज ने चौंकते हुए कहा, क्या ऐसा कुकृत्य महारानी से हुआ है। दीवान ने बताया कि महाराज, आज पर्व का दिन था। सूर्योदय के पूर्व महारानीजी गंगा मैया का पूजन और स्नान करने गईं थीं। स्नान के बाद वे सर्दी से कांपने लगीं और तुरंत आग जलाने को कहा। पास में जलाऊ सामग्री नहीं मिलने पर उन्होंने झोंपड़ी जला देने को कहा। उनकी आज्ञानुसार उसके अन्दर सोने वालों को और सामान को हटाकर उसे जला दिया गया। आग की तपिश से महारानीजी की सर्दी गायब हो गई। इसी दौरान हवा के झोंके से आग की लपट दूसरे झोंपड़ों में भी चली गई और इस तरह सब झोंपड़े जलकर राख हो गए। महाराज ने कहा, ओह! यह बहुत बड़ा अपराध है। दूसरे का घर जलाकर अपना हाथ सेंकना। महारानी के राजकीय आभूषण और वस्त्र उतार लिए जाएं और उन्हें एक नौकरानी के वस्त्र पहनाकर दरबार में लाया जाए।
नौकरानी के भेष में महारानी ने आते ही घुटने टेककर अभिवादन किया और सिर झुकाकर अपने अपराध के लिए क्षमा याचना की। महाराज कड़ककर बोले, दोषी महारानी, न्याय सभी के लिए समान है। अपराधी को दण्ड मिलना ही चाहिए, चाहे वह कोई भी हो। महारानी ने हाथ जोड़कर कहा, आप न्यायावतार हैं, मुझसे अपराध अवश्य हुआ है। महाराज ने कहा, तो सुनो। आज से तुम महारानी नहीं, महल की नौकरानी रहोगी। जितनी तनख्वाह, भोजन, वस्त्र दूसरी सेविकाओं को मिलता है, उतना ही तुम्हे मिलेगा। जितना खर्च राज्य का झोंपडिय़ां बनवाने में लगेगा, उतना तुम्हारी तनख्वाह से हर माह वसूला जाएगा। पूरा वसूल होने पर तुम्हारी दण्डावधि पूरी मानी जाएगी।
यह सुनकर महारानी फूट-फूटकर रोने लगी। दीवानजी और दरबारी गण ने महाराज से क्षमा करने की विनती की, लेकिन न्यायप्रिय राजा टस से मस नहीं हुआ। राजा ने कहा, न्याय की तुला सभी के लिए समान है, क्या राजा, क्या प्रजा।
( साभार: बोधकथा मंजरी)